Snow Leopards of Gurez (HINDI): गुरेज़ के स्नो लेपर्ड्स
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यह पुस्तक 1999 के कारगिल संघर्ष के उस अनसुने और लगभग भुला दिए गए अध्याय को सामने लाती है, जो गुरेज़–तुलैल सेक्टर में लड़ा गया था। कारगिल युद्ध पर बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन अधिकांश विवरण मश्कोह, द्रास, काक्सर और बटालिक जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित रहे हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य उस मौन मोर्चे की कहानी कहना है, जहाँ ‘स्नो लेपर्ड ब्रिगेड’ के सैनिकों ने दूरदर्शिता, साहस और दृढ़ संकल्प के साथ ऐसे कदम उठाए, जिनका प्रभाव केवल अपने क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे युद्धक्षेत्र पर पड़ा।
पुस्तक की शुरुआत लेफ्टिनेंट जनरल डी.पी. पांडे की स्मृतियों और अनुभवों से होती है। लेखक के साथ गुरेज़ की पुनः यात्रा और उन सैनिकों से जुड़ी यादों ने इस कथा को आकार दिया। बर्फ से ढकी दुर्गम चौकियों, कठिन पर्वतीय परिस्थितियों, खुफिया सूचनाओं, निर्णय लेने की चुनौतियों और अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों के अनुभवों के माध्यम से पाठक उस युद्ध को एक अलग दृष्टिकोण से देखता है। इसमें उन तोपचियों का भी उल्लेख है, जिन्होंने कठिन ऊँचाइयों तक बोफोर्स तोपें पहुँचाईं और उन स्थानीय नागरिक कुलियों का भी, जिनका योगदान अक्सर युद्ध के आधिकारिक इतिहास में दर्ज नहीं हो पाता।
यह केवल युद्ध और वीरता की कहानी नहीं है, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने, पहल करने और संभावित संकट को पहले ही पहचान लेने की कहानी भी है। इसमें सैन्य नेतृत्व, मानवीय साहस, संस्थागत जिम्मेदारी और युद्ध से मिलने वाली महत्वपूर्ण सीखों को सामने रखा गया है।
अंततः यह पुस्तक याद दिलाती है कि इतिहास केवल उन घटनाओं से नहीं बनता जो घटित हुईं, बल्कि उन घटनाओं से भी बनता है जिन्हें हम याद रखते हैं और जिन्हें समय के साथ भूल जाते हैं। गुरेज़ की यह कहानी अब विस्मृति का हिस्सा नहीं, बल्कि कारगिल संघर्ष और भारतीय सैन्य इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
