1965 : Pakistani Ghamand ka "Asal Uttar
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1965 के युद्ध के दौरान, खेमकरण शहर के आसपास की नहरों और सिंचाई के जाल को भारत की रक्षात्मक स्थिति के लिए एक प्राकृतिक बाधा माना जाता था, लेकिन यह क्षेत्र देखने में जितना दुर्गम लगता था, वास्तव में उतना नहीं था। 6 सितंबर को भारत ने इसे पार कर आक्रामक अभियान शुरू करने का प्रयास किया, लेकिन पाकिस्तानी तोपखाने के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। भारतीय सैन्य टुकड़ियों को पीछे हटने, पुनर्गठित होने और अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मजबूर होना पड़ा। वह स्थान असल उत्तर था, जिसका अर्थ है “सच्चा उत्तर”।वह रेखा किसी ऐसी चीज़ से बनी हुई नहीं थी, जिसे शास्त्रीय अर्थों में किला कहा जा सके।
वास्तव में, यह थके हुए सैनिकों द्वारा खींची गई एक पतली रक्षात्मक रेखा थी, जो अपने हाथों में राइफलें और टैंकों को रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले कुछ हथियारों के साथ डटे हुए थे। लेकिन लगातार दबाव के बावजूद यदि यह रेखा टूट जाती, तो पंजाब के मैदानों की रक्षा करना लगभग असंभव हो जाता।भारतीय सेना के शर्मन टैंक पाकिस्तानी M47 और M48 पैटन टैंकों के विरुद्ध लगातार संघर्ष कर रहे थे, जिन्हें तकनीकी रूप से स्पष्ट बढ़त हासिल थी। 1965: पाकिस्तानी घमंड का 'असल उत्तर' उस समय का वर्णन करता है, जब भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान के आधुनिक बख्तरबंद डिवीजन का सामना किया, जो बड़ी संख्या और अपने हथियारों पर विश्वास के साथ आगे बढ़ रहा था।यह पुस्तक ब्रिगेडियर हरसिंह विर्क, जो पंजाब के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित घुड़सवार रेजिमेंटों में से एक के अधिकारी थे, द्वारा लड़ी गई उस लड़ाई का विस्तृत और गहन वर्णन प्रस्तुत करती है।
आधिकारिक दस्तावेज़ों और भारतीय सेना के प्रत्यक्ष विवरणों के आधार पर तैयार यह पुस्तक भारत के सैन्य इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को दर्ज करती है और इसमें ऐसे अनेक महत्वपूर्ण सबक हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं।
