1962 : Nam Ka Chu' Ki Kali Chaya
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20 अक्टूबर 1962 को नामका चू की जमा देने वाली घाटी में 2 राजपूत और अन्य रेजिमेंटों की टुकड़ियों ने लगातार आगे बढ़ती चीनी सेना के सामने असंभव परिस्थितियों का सामना किया। चीनी सैनिकों की संख्या लगातार बढ़ रही थी और वे घाटी की ऊँचाइयों पर कब्ज़ा कर चुके थे। दूसरी ओर, भारतीय सैनिक अपर्याप्त कपड़ों, सीमित गोला-बारूद और बेहद कठिन भू-भाग जैसी परिस्थितियों से जूझ रहे थे।
इन विषम परिस्थितियों के बावजूद 2 राजपूत, 7 इन्फैंट्री और 1/9 गोरखा राइफल्स की टुकड़ियाँ दोनों मोर्चों से भारी हमले के सामने डटी रहीं। 1962: ’नाम का चू’ की काली छाया में मेजर जनरल अशोक कल्याण वर्मा और शिव कुणाल वर्मा भारत-चीन युद्ध की विनाशकारी लड़ाइयों का एक विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। यह पुस्तक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में दिखाए गए असाधारण साहस, आत्मबलिदान और हर परिस्थिति में जीवित रहने के संघर्ष की कहानी बताती है। मेजर जनरल अशोक कल्याण वर्मा के अभिलेखीय स्रोतों और लेखों के आधार पर यह पुस्तक भारत के सैन्य इतिहास के सबसे कठिन और अंधकारमय दिनों में से एक का पुनरावलोकन करती है।
